जिस होटल में ठहरना पसंद करते रहे सोनिया गांधी, बिग बी और सचिन तेंदुलकर, उसी वाइल्ड फ्लावर हॉल को लीज पर देगी सुक्खू सरकार

हिमाचल क्राइम न्यूज
शिमला। ब्यूरो


शिमला से कुछ ही किलोमीटर दूर छराबड़ा नामक मनोरम स्थल है. ये जगह वीवीआईपी मैप पर इसलिए आती है क्योंकि यहां के आसपास राष्ट्रपति के लिए कल्याणी हैलीपैड है. इसी हैलीपैड पर राष्ट्रपति सेना के विमान से आती हैं और फिर रिट्रीट में ठहरती हैं. इसी छराबड़ा में प्रियंका वाड्रा ने अपने सपनों का आशियाना बनाया है और यहीं पर है विश्वविख्यात होटल वाइल्ड फ्लावर हॉल. ये होटल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर सहित कई वीवीआईपी का शिमला की वादियों में ठहरने का पसंदीदा डेस्टीनेशन रहा है.

ये संपत्ति कभी ब्रिटिश शासकों की हुआ करती थी. आजादी के बाद कई पड़ावों से गुजर कर ये ओबेरॉय समूह का होटल रहा. मौजूदा कांग्रेस सरकार के समय इस संपत्ति का मालिकाना हक वापस राज्य के पास आया है. अब ये संपत्ति एक बार फिर से चर्चा में आई है. इस बार चर्चा का कारण इसे लीज पर देने की तैयारी को लेकर है. आखिर क्या है इस संपत्ति की अहमियत और क्यों हिमाचल सरकार इसे लीज पर देना चाहती है, आगे कुछ बिंदुओं पर चर्चा की जाएगी.

अंग्रेज हुकूमत से जुड़ा वाइल्ड फ्लावर हॉल का इतिहास
आजादी से पहले देश पर ब्रिटिश राज के समय शिमला समर कैपिटल थी. यहां वायसराय से लेकर अन्य बड़े ब्रिटिश अफसर व सैन्य कमांडर रहा करते थे. शिमला के समीप छराबड़ा में उस समयकाल में अंग्रेज कमांडर-इन-चीफ लार्ड किचनर ने सबसे पहले यहां रहना शुरू किया था. ये बीसवीं सदी के आरंभ के वर्ष 1902 की बात है. ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ लार्ड किचनर ने छराबड़ा में इस स्थान पर एक आवास बनवाया. उसी दौर में अंग्रेज लार्ड कर्जन का मशोबरा में निवास हुआ करता था. लार्ड किचनर ने भी छराबड़ा में पहाड़ी परिस्थितियों में काम आने वाली रिहायश बनवाई. ये धज्जी दीवाल परंपरा की कंस्ट्रक्शन थी. मकान की छत स्लेटपोश थी. समय बीता और वर्ष 1947 में देश आजाद हुआ. आजादी के बाद ये प्रॉपर्टी नियमों के अनुसार भारत सरकार की हो गई.

हिमाचल के गठन के बाद भारत सरकार ने ये संपत्ति राज्य सरकार के पर्यटन विभाग को सौंप दी. वर्ष 1990 में ये संपत्ति होटल कारोबार के विख्यात नाम ओबेरॉय समूह के पास आई. मार्च 1993 में यहां आग लग गई और होटल पूरी तरह से नष्ट हो गया. वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वर्ष 1995 में पर्यटन विकास निगम के इस होटल को निजी हाथों में देने का फैसला लिया. इस प्रकार अक्टूबर 1995 को इस संपत्ति को लेकर ईस्ट इंडिया होटल (ईआईएच) के साथ जॉइंट वेंचर एग्रीमेंट यानी संयुक्त उपक्रम समझौता साइन किया गया. इस समझौते में तय किया गया कि यहां फाइव स्टार होटल बनाया जाए और उसका संचालन किया जाए.

वर्ष 1997 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ही इस मामले में कन्वेंयस डीड के माध्यम ये भूमि मशोबरा रिसोर्ट लिमिटेड (एमआईएल) के पक्ष में स्थानांतरित कर दी. जॉइंट वेंचर परियोजना की कुल लागत 40 करोड़ आंकी गई. चूंकि ये जमीन हिमाचल सरकार की थी, लिहाजा सरकार के लिए भूमि के रूप में 35 प्रतिशत भागीदारी तय हुई. कांग्रेस सरकार के समय इस परियोजना की लागत लगातार बढ़ती गई और यह लागत सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गई.


ये संपत्ति आरंभ से ही विवादों में रही है. हिमाचल में जिस समय सत्ता परिवर्तन हुआ और जयराम ठाकुर ने सीएम की कुर्सी संभाली तो ये मामला विधानसभा में उठा. वर्ष 2019 में अगस्त महीने में शिमला में विधानसभा के मानसून सेशन में तत्तकालीन सीएम जयराम ठाकुर ने कहा था कि पूर्व की कांग्रेस सरकार ने इस परियोजना में राज्य की घटती भागीदारी के मामले में कोई सार्थक कदम नहीं उठाया.

उस समय सीएम जयराम ने कहा था कि भाजपा की प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व वाली सरकार के समय 2002 में ईस्ट इंडिया होटल के साथ जॉइंट वेंचर अग्रीमेंट को रद्द किया गया. कंपनी इस मामले में हाईकोर्ट गई थी. हाईकोर्ट ने इस केस में एक आर्बिट्रेटर नियुक्त किया था. आर्बिट्रेटर ने 23 जुलाई 2005 को इस मामले में अवार्ड दे दिया था. उस अवार्ड के अनुसार यह भूमि राज्य सरकार को वापिस होनी है और सरकार इसे लीज पर कंपनी को देगी.

हिमाचल सरकार ने आर्बिट्रेटर के फैसले को मान लिया, लेकिन ईस्ट इंडिया होटल्स लिमिटेड ने इस अवार्ड के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका डाल दी. वर्ष 2016 में वो याचिका खारिज हो गई. फिर मामला हाईकोर्ट की डबल बैंच में गया. हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर 2022 को वाइल्ड फ्लावर होटल की संपत्ति के मामले में ईस्ट इंडिया होटल्स (ईआईएच) की तरफ से दाखिल की गई अपील को खारिज कर दिया था. उस समय हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान (अब झारखंड हाईकोर्ट के सीजे) व न्यायमूर्ति सीबी बारोवालिया की डिविजन बैंच ने फैसला दिया था.

हिमाचल के खजाने को होता रहा नुकसान
छराबड़ा में होटल जिस भूमि पर बना है, वो हिमाचल सरकार की है. जब वर्ष 1995 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान वाइल्ड फ्लावर हॉल की निर्माण हुआ तो जमीन की कीमत 7 करोड़ रुपए तय की गई थी. उस दौरान निर्माण का पूरा प्रोजेक्ट चालीस करोड़ रुपए लागत का था. ईआईएच कंपनी ने चालाकी करते हुए प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़ा दी, लेकिन सरकार के स्वामित्तव वाली जमीन की लैंड वैल्यू नहीं बढ़ाई. फिर राज्य सरकार को 1995 से इक्विटी के रूप में सालाना एक करोड़ रुपए देने तय हुए थे. लेकिन हाईकोर्ट में केस की जल्द सुनवाई नहीं होने से हिमाचल को 2023 तक 28 करोड़ रुपए की इक्विटी का नुकसान हो चुका था.

खैर, लंबे कानूनी विवादों के बीच ये संपत्ति सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय हिमाचल की हो गई. यहां जिक्र करना जरूरी है कि 1995 में जॉइंट वेंचर में ये आलीशान इमारत बनी, तब जमीन की कीमत 7 करोड़ व प्रोजेक्ट की 40 करोड़ थी. संयुक्त उपक्रम की शर्त ये थी कि 20 करोड़ की इक्विटी राज्य की होनी थी और सात करोड़ रुपए की जमीन को मिलाकर हिमाचल का कुल हिस्सा 35 फीसदी बना. संयुक्त उपक्रम कंपनी में 35 फीसदी हिमाचल का शेयर होने के बाद कंपनी का चेयरमैन हिमाचल सरकार के मुख्य सचिव बने.

कंपनी ने चालाकी से प्रोजेक्ट की कीमत को चालीस करोड़ रुपए से बढ़ाकर सौ करोड़ रुपए कर दी, लेकिन जमीन की कीमत उस हिसाब से नहीं बढ़ाई वो सात करोड़ रुपए ही रही. ऐसे में जो प्रोजेक्ट चालीस करोड़ का था और हिमाचल का शेयर 35 फीसदी था, उसकी कीमत जब सौ करोड़ हुई तो जमीन की वैल्यू न बढ़ाने से हिमाचल का हिस्सा घटकर 14 फीसदी रह गया. उस समय के पर्यटन सचिव आईएएस अशोक ठाकुर ने आपत्ति जताई तो मामला ऑर्बिट्रेशन में गया था. बाकी तथ्यों का जिक्र ऊपर किया गया है कि कैसे जयराम ठाकुर ने विधानसभा में कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि हिमाचल की घटती भागीदारी (35 फीसदी से 14 फीसदी)को लेकर कांग्रेस सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया था.

सुप्रीम कोर्ट से मिली थी सुक्खू सरकार को जीत
विवादों में रहे वाइल्ड फ्लावर हॉल होटल मामले में वर्तमान सरकार को सुप्रीम कोर्ट से जीत मिली थी. दरअसल, ईआईएच (ईस्ट इंडिया होटल्स लिमिटेड) ने केस में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. सुप्रीम कोर्ट से 20 फरवरी 2024 को वाइल्ड फ्लावर हॉल का पूरा स्वामित्व व कब्जा राज्य सरकार को देने का आदेश जारी किया था. मार्च 2025 को राज्य सरकार ने होटल वाइल्ड फ्लावर हॉल का फिजिकल पोजेशन ले लिया था. राज्य सरकार के कब्जे में आने के बाद होटल को सरकारी कंपनी के माध्यम से संचालित किया जा रहा है. मशोबरा रिजार्ट लिमिटेड के बैनर तले होटल वाइल्ड फ्लावर हॉल चल रहा है. इसी संपत्ति से सुक्खू सरकार को सीएसआर के रूप में मई महीने में 73.92 लाख रुपए की रकम मिली है. अब इस संपत्ति को लीज पर देने को लेकर आमंत्रित ई-ऑक्शन से नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है.


नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया कि इस मामले में किसी कंपनी विशेष को लाभ पहुंचाने की मंशा दिख रही है. जयराम ठाकुर ने कहा कि पहले तो सीएम सुक्खू ने कहा था कि इस संपत्ति को सरकार ही चलाएगी. अब ऑक्शन की जा रही है. जयराम ठाकुर ने इस मामले में सुक्खू सरकार पर अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए हिमाचल ऑन सेल शुरू कर दिया है. फिलहाल, ये मामला अभी और तूल पकड़ता नजर आ रहा है.


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