मौखिक सलाह के लिये लाखों का खर्च क्यों?

हिमाचल क्राइम न्यूज 

शिमला। संपादकीय (डॉ बलदेव शर्मा)



 सुक्खू सरकार ने अभी फिर 350 करोड़ का कर्ज विकास के नाम पर लिया है। यह कर्ज लेने के बाद सरकार का कर्ज भार एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। अभी सरकार का कार्यकाल करीब दो वर्ष शेष है। चालू वित्त वर्ष में ही सरकार का राजकोषीय घाटा दस हजार करोड़ से बढ़कर बारह हजार करोड़ होने का अनुमान है। यह आंकड़े इस बात का सूचक है कि आने वाले समय में यह कर्जभार और भी बढ़ेगा। भारत सरकार भी प्रदेश सरकार को अन्ततः कर्ज की अनुमतियां देती रहेगी। प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा इसके लिये एक दूसरे को दोष देने की रस्म अदायगी भी निभाती रहेगी। सुक्खू सरकार ने भ्रष्टाचार पर व्यवस्था परिवर्तन करते हुये अपने सौंपे आरोप पत्रों पर जब कोई कारवाई नहीं की तो भाजपा ने भी इसी सद्भावना को बढ़ाते हुये आरोप पत्रों की संस्कृति को ही नकार दिया है। दोनों दलों के इस आपसी सौहार्द का ही परिणाम है कि रोजगार के क्षेत्र में मल्टीटास्क वर्कर से शुरू होकर आज प्रदेश मित्र योजना तक पहुंच गया है। 


इन योजनाओं का प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। क्योंकि भ्रष्टाचार पर सरकार का व्यवहारिक रूप क्या है यह सदन में रखी गयी कैग रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया है। कर्ज के इस पहाड़ को देखकर आम आदमी भी यह सोचने लग पड़ा है कि आखिर यह कर्ज निवेश कहां हुआ है। सरकार की योजनाओं और वायदों की व्यवहारिकता पर प्रश्न उठने लग पड़े हैं। क्योंकि सरकार के ब्यानी दावों और जमीनी हकीकत में कहीं कोई मेल नहीं है। क्योंकि योजनाओं के लाभार्थियों और उसके लिये करों के रूप में भरपाई करने वालों में तो हर आदमी शामिल है। इस स्थिति ने आम आदमी को सरकार के हर फैसले पर गुण दोष के आधार पर विवेचना शुरू कर दी है। जब इस सरकार ने कार्यभार संभाला था तब मंत्रिमंडल के गठन से पहले मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां की गयी थी। इन नियुक्तियों के पक्ष में कई तर्क दिये गए थे। लेकिन जब इन नियुक्तियों पर उच्च न्यायालय का चाबुक चला तो इन्हें हटना पड़ा है। आज तक प्रदेश उनके बिना चल रहा है और सरकार के कामों पर कोई प्रतिफूल प्रभाव नहीं पड़ा है। इससे यह सवाल स्वतः ही खड़ा हो जाता है कि उनकी कोई कानूनी आवश्यकता नहीं थी। केवल मित्र संस्कृति का निर्वाह था। इसी तरह मुख्यमंत्री की सहायता के लिए पांच सलाहकार नियुक्त हैं। सलाहकारों की नियुक्ति के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। मुख्यमंत्री की कार्यकारी शक्तियों के तहत यह नियुक्तियां की जाती हैं। 


इसलिये इनके पास कोई फाइल वर्क नहीं होता है। लेकिन इनके वेतन भत्ते और अन्य सुविधायें सरकारी कोष से दी जाती है। जिस भी व्यक्ति को सरकारी कोष से भुगतान होता है वह आरटीआई के दायरे में आ जाता है। विधानसभा में विधायक सुधीर शर्मा और आशीष शर्मा के एक प्रश्न के उत्तर में मुख्यमंत्री ने यह सूचना दी है कि यह सलाहकार उन्हें मौखिक रूप में सलाह ही देते हैं। इस सूचना से यह सवाल खड़ा हो जाता है कि जब प्रदेश पहले से ही वित्तीय संकट में चल रहा था और मुख्यमंत्री को यह चेतावनी देनी पड़ी थी कि प्रदेश के हालात कभी भी श्रीलंका जैसे हो सकते हैं तो फिर मौखिक सलाह के लेने के लिए इतना बड़ा खर्च करने की क्या आवश्यकता थी। आने वाले दिनों में सरकार के इस तरह के खर्चे निश्चित रूप से चर्चा का विषय बनेगें यह तय है.


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