कौन है हिमाचल कि बर्बादी का कारण, प्रदेश में क्यों हो रहा बारिश से इतना नुकसान, जानिए एक्सपर्ट से असली कारण

हिमाचल क्राइम न्यूज़ 
शिमला। वेब डेस्क


हिमाचल में इस बार मानसून सीजन की शुरुआत में ही रही भारी बारिश ने वर्ष 2023 के भयानक प्राकृतिक आपदाओं के पुराने जख्मों को ताजा कर दिया है. कभी जिस धरती को लोग देवभूमि कहकर पूजते थे, आज वही धरती दर्द की कहानियां सुना रही है. हिमाचल की वादियों में गूंजती शांति अब चीखों में बदलती जा रही है. बचपन से जिन पहाड़ों को हमने अपनी ताक़त माना, आज वही पहाड़ हमारे सामने टूटते नज़र आते हैं. गांव के गांव उजड़ रहे हैं, हर साल बरसात आते ही न जानें कितने घर जमीन में समा रहे हैं, इसका गुनेहगार कौन है?

हिमाचल हर साल क्यों त्रासदी झेल रहा है. पहाड़ी प्रदेश में लगातार बादल फटने और फ्लैश फ्लड के बढ़ते कारणों को लेकर ईटीवी भारत ने एनवायरनमेंट साइंस टेक्नोलॉजी एंड क्लाइमेट एक्सचेंज डिपार्टमेंट के प्रमुख वैज्ञानिक अधिकारी डॉ सुरेश अत्री बात की और जानने का प्रयास किया है कि मानसून सीजन में भारी बारिश के रूप में कुदरत अपना कहर बरपा रही है या फिर ये मानव निर्मित आपदा है.

एक महीने के अंदर 92 लोगों की मौत
प्रदेश में 20 जून को हुए मानसून की एंट्री के बाद से ही कई स्थानों पर लैंडस्लाइड, फ्लैश फ्लड और बादल फटने की घटनाओं से भारी तबाही हुई है. छोटे पहाड़ी राज्य में 22 दिनों के अंतराल में ही 92 लोग मानसून में जान गंवा चुके हैं, 33 लोग लापता हैं और 172 घायल हुए हैं. प्रदेश में अब तक विभिन्न जिलों में 31 फ्लैश फ्लड, 17 लैंडस्लाइड और 22 घटनाएं हुई हैं, जिससे अब सरकारी और निजी संपत्ति को 751.78 करोड़ का नुकसान हुआ है. वहीं, इस दौरान 380 पक्के और कच्चे मकान मलबे के ढेर में बदल गए. 619 पक्के और कच्चे मकानों को आंशिक नुकसान पहुंचा है. मानसून में इस बार 769 गौशालाएं और 184 दुकानों/फैक्ट्रियों तबाह हो गई हैं. प्रदेश में 21,500 पोल्ट्री बर्डस और 953 पशुओं की भारी बारिश की वजह से मौत हो चुकी है.


कुदरत का कहर या इंसान जिम्मेवार
प्रदेश में लगातार बढ़ रही बादल फटने और फ्लैश फ्लड की घटानाओं से हर साल सैकड़ों लोगों अकाल मौत के ग्रास बन रहे है. वहीं, बाढ़ और भूस्खलन के कारण मानसून सीजन में सरकारी और निजी संपत्ति को हजारों करोड़ का नुकसान हो रहा है. इस बारे में एनवायरनमेंट साइंस टेक्नोलॉजी एंड क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सुरेश अत्री का कहना है कि 'मैं नहीं समझता हूं की प्रकृति का इसमें कसूर है. यह मानवीय कारण है, क्योंकि बारिश हिमाचल प्रदेश में ही नहीं हो रही दो-तीन दिन पहले अभी अमेरिका के टेक्सास, स्पेन और चीन में सभी जगह बहुत ज्यादा फ्लडिंग ऑब्जर्व की गई है. ऑस्ट्रेलिया में भी हेवी रेनफॉल हुई है ये एक वैश्विक कारण है. इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग मुख्य वजह है.मानव निर्मित कार्यों को लेकर एक होड़ और रेस सी लगी है, इसमें चारों तरफ चाहे औद्योगिकरण, शहरीकरण, जंगलों का कटान या फिर जंगलों में लगने वाली आग जैसी घटनाओं से वैश्विक तापमान में एक बदलाव आया है. वैश्विक तापमान ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ा है. का बढ़ना है, जिसमें सबसे बड़ा कारण मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन है.इसके कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, क्योंकि इन गैसों के बढ़ने से सूर्य ताप वापस नहीं लौट पाता.'

हिमाचल में क्यों बढ़ी लैंडस्लाइड की घटनाएं
हिमाचल में पिछले कई सालों से भारी बारिश होने से लैंड स्लाइडिंग की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही है. हिमाचल में नए-नए बन रहे फोरलेन के किनारे लैंड स्लाइडिंग आम हो चुकी है. चंडीगढ़-मनाली एनएच पर इस साल भी भारी स्लाइडिंग हो रही है. आज से कुछ साल पहले इस तरह की घटनाएं बेहद कम होती थी, लेकिन हालिया सालों में ये घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं.

लैंड स्लाइडिंग की इन घटनाओं को लेकर डॉ. सुरेश अत्री का कहना है कि 'तापमान जब बढ़ता है तो हमारे मिट्टी चट्टानों और भूमि की नमी को सोख लेता है, लेकिन इसका साइड इफेक्ट ये है कि गर्मियों में नमी न होने से मिट्टी भुरभुरी सी हो जाती है. उसकी जब नामी खत्म होती है तो मिट्टी की होल्डिंग कैपेसिटी खत्म हो जाती है. ऐसे में जब तेज बारिश होती है तो भूमि का कटाव शुरू हो जाता है. दूसरा जो मानवीय कारण है हिमाचल में बन रहे फोरलेन हैं. इसमें ठेकेदार के वर्कर, जेसीबी और पोकलेन के ड्राइवर जो कटिंग कर रहे हैं वो सीधा 80 या 90 डिग्री में पहाड़ों को काट रहे हैं. काम करते समय पहाड़ी के ड्रेनेज सिस्टम को समझा नहीं जा रहा है. पानी कहां से गिरेगा किस तरह का नीचे नुकसान हो सकता है इसका अध्ययन नहीं किया जा रहा. अवैज्ञानिक तौर कटिंग की जा रही है और इसकी मॉनिटरिंग भी सही तरह से नहीं हो रही है. जहां टनलों बात है पक्के तौर पर जब टनलों के अंदर कटिंग की जाती है तो इंपैक्ट मिट्टी और चट्टानों पर नजर आता है. टनलों में भी ब्लास्टिंग सही तरह से नहीं हो रही होगी तो पहाड़ पूरे के पूरे दरकने स्वाभाविक है. ऐसे में जब भी भारी बारिश होगी तो नुकसान होने के अधिक चांस होंगे.'

हिमाचल में फ्लैश फ्लड के कारण
आजकल फ्लैश फ्लड की घटनाएं भी देखने मिल रही हैं. इसे रिहायशी इलाकों में भारी नुकसान हो रहा है. इससे जान माल की हानि हो रही है. इसके पीछे अवैध तरीके से हो रही मलबे की डंपिंग सबसे बड़ा कारण है. फ्लैश फ्लड की घटनाओं को लेकर सुरेश अत्री ने कहा कि 'कटिंग से निकलने वाले मलबे को सीधे अवैध तरीके से जंगलों और नालों में फेंका जा रहा है. उससे जब तेज बारिश होती है तो बाढ़ जैसे हालात बनते हैं. इस वर्ष भी यही हुआ है कि जहां सड़कों के किनारे, जंगलों में अवैध तरीके से डंप किया गया मलबा और जहां जमीन भुर भुरी थी, वहां पर बादल फटने यानी एक या दो स्क्वेयर किलोमीटर में 100 मिलीमीटर से अधिक बारिश हुई तो उसको मलबा सहन नहीं कर पाया, जिस कारण पानी के तेज बहाव के साथ मलबे बह गया. सही ड्रेनेज सिस्टम न होने से उसका कम्यूलेटिव असर नजर आया.

बड़ी-बड़ी मशीनें पहाड़ों को कर रही खोखला
वहीं, पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य कर रहे पद्मश्री नेकराम शर्मा का कहना है कि 'बारिश से पहले भी होती थी, लेकिन इतना अधिक नुकसान नहीं होता था. अवैज्ञानिक तरीके से कटिंग होने और पहाड़ों पर सड़क और अन्य प्रोजेक्टों के निर्माण से निकलने वाले मलबे को जंगलों और नालों में डंप किया जा रहा है, जिस कारण भारी बारिश से अधिक नुकसान हो रहा है. जंगलों में पेड़ और झाड़ियां को काटा जा रहा है आग लगने की घटनाओं से झाड़ियों का अस्तित्व खत्म हो रहा है, जिससे जमीन पर मिट्टी की पकड़ कमजोर हुई है. जंगलों में अवैध अतिक्रमण हो रहा है और लोग खेत बनाने के लिए जंगलों में पेड़ों को काट रहे हैं. वहीं, जंगलों में उगी घास को स्प्रे करके जलाया जा रहा है. उससे भी भारी बारिश के दौरान पानी एक साथ बहकर अधिक नुकसान पहुंचता है.

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बादल फटने की घटनाओं से नुकसान

प्रदेश में इस बार 20 जून को मानसून की एंट्री हुई थी, जिसके बाद से अब तक प्रदेश में बादल फटने की 22 घटनाएं सामने आ चुकी हैं. 2023 में भी बादल फटने की कई घटनाएं हुई थी. इससे लाखों का नुक्सान हुआ था. इसके साथ ही कई लोगों की मौत भी हुई थी. बादल का फटना क्या होता है. इसका जवाबब जानने का प्रयास भी हमने किया. एनवायरनमेंट साइंस टेक्नोलॉजी एंड क्लाइमेट एक्सचेंज डिपार्टमेंट के प्रमुख वैज्ञानिक अधिकारी डॉ सुरेश अत्री ने कहा कि 'जब तापमान बढ़ता है तो ये नमी की होल्डिंग क्षमता को बढ़ा देता है. कहने का मतलब यह है की हवा में नमी बहुत ज्यादा अधिक हो जाती है. ऐसे में तापमान ज्यादा होता है तो नीचे से यह पूरी नमी को रोक लेता है. ऐसे में एटमॉस्फेयर में नमी की होल्डिंग क्षमता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. उससे अचानक ही हेवी रेनफॉल होती है. जब छोटे से एरिया में एक घंटे में बिना रुके एक ही स्पीड में 100 एमएम से अधिक की बारिश होती है तो इसे क्लाउड बर्स्ट कहा जा सकता है.'

इस साल बादल फटने की घटनाएं अधिक क्यों?

बादल का फटना वैज्ञानिक कारण है, लेकिन हालिया सालों में इस तरह से इतनी कम समय में अधिक बादल फटने की घटनाएं चिंताजनक हैं. सीएम सुक्खू भी मीडिया सामने बादल फटने की घटनाओं पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं. इस पर डॉ सुरेश अत्री ने कहा 'इस बार गर्मी के मौसम में काफी ज्यादा गर्मी पड़ी. हवा में पहले से ही नमी थी. ऐसे में नमी बार-बार ऊपर की ओर उठती रही. दूसरे वेस्टर्न डिस्टरबेंस का भी प्रभाव बना हुआ है. इसके अलावा मानसून की एंट्री भी टाइम पर हुई. दोनों प्रभाव के आपस में एकसाथ मिलने से भारी बारिश का माहौल बन गया, जिससे प्रदेश में इस बार बादल फटने की अधिक घटनाएं सामने आई हैं.'

हिमाचल में 10 साल में मानसून सीजन
हिमाचल में पिछले 10 साल के मानसून सीजन में हुई बारिश के आंकड़े पर गौर करें तो साल 2015 में 638.2 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जो सामान्य से 16.4 फीसदी कम थी. इसी तरह से साल 2016 के मानसून सीजन के दौरान 623.9 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई थी, बारिश का ये आंकड़ा सामान्य से 18.3 फीसदी कम रहा. साल 2017 में 717.2 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 6.1 फीसदी कम रिकॉर्ड की गई. वहीं साल 2018 में 927.0 मिलीमीटर बारिश हुई, यह सामान्य से 21.4 फीसदी अधिक दर्ज की गई. इसी तरह से साल 2019 में 686.9 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जो सामान्य से 10 फीसदी कम रही। साल 2020 में मानसून सीजन के दौरान 567.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, यह बारिश सामान्य से 25.4 फीसदी कम थी. ऐसे ही साल 2021 में 688.6 मिलीमीटर बारिश हुई, जोकि सामान्य से 9.8 फीसदी कम दर्ज की गई. प्रदेश में साल 2022 में 716.2 मिलीमीटर बारिश हुई, यह सामान्य से 2.5 मिलीमीटर कम थी. वहीं, साल 2023 में 886.0 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जोकि सामान्य से 21 फीसदी अधिक थी. इसी तरह से साल 2024 में मानसून सीजन के दौरान प्रदेश में 600.9 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी, बारिश का ये आंकड़ा समय से सामान्य से 18 फीसदी कम रहा.

कैसे रोका जाए नुकसान
प्रदेश में हर साल बादल फटने और लैंड स्लाइडिंग सहित फ्लैश फ्लड की घटनाओं से हर साल सैकड़ों लोगों की जान जा रही है. इसके अलावा सैकड़ों की संख्या में पशुओं की मौत हो रही है. संपत्ति को भी सैकड़ो करोड़ का नुकसान हो रहा है. इस तरह भविष्य में नुकसान की आशंका को कम करने को लेकर पद्मश्री नेकराम शर्मा का कहना है कि 'नए प्रोजेक्ट, फोरलेन बनाने के लिए पहाड़ों को काटने के लिए बड़ी-बड़ी मशीनें लगाई जा रही हैं, जो पहाड़ों को हिलाकर खोखला कर रही हैं. इस पर सख्ती होनी चाहिए. सरकार को नदी और नालों के समीप घरों के निर्माण पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए. इससे नदी और नालों में पानी के बहने का रास्ता बंद हुआ है. ऐसे में भारी बारिश के दौरान बाढ़ आने से पानी अपने साथ लाए मलबे और पत्थरों के साथ मकान को रौंद कर आगे निकल जाता हैं, जिससे जान और माल के नुकसान का आंकड़ा अधिक बढ़ रहा है.'

डॉ. सुरेश अत्री ने कहा कि 'सबसे पहले तो हमें प्रदेश में निर्वाणधीन प्रोजेक्टों का रिव्यू करना चाहिए. इसके साथ हमें प्रशासनिक तौर पर भी देखना चाहिए कि कार्यों में कितनी वैज्ञानिक कमियां रह गई हैं और हम इसको कितना इंप्रूव कर सकते हैं. इसके लिए पैरामीटर को कितना फॉलो किया जा रहा है. इसे चेक किया जाना बहुत जरूरी है. इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलप हो रहा है, उसमें ड्रेनेज की क्या व्यवस्था है? ताकि जब भारी बारिश होगी तो वे प्रोजेक्ट उसे सहन कर सकें. इसी तरह से जो ठेकेदार सड़कों और रास्तों को बनाने का काम कर रहे हैं, वो सभी जंगलों और नालों में अवैध डंपिंग न करें, क्योंकि भारी बारिश में यही मलबा बाढ़ का बड़ा रूप धारण करते हुए बहुत अधिक नुकसान पहुंचा सकता है, जिसका परिणाम बहुत ही भयावह होता है.'

कानून बनाएगी सरकार
नदी नालों के किनारे हो रहे अंधाधुंध निर्माण को लेकर सरकार भी सख्त हो गई है. बढ़ती आबादी और जमीन के आभाव के कारण लोगों ने नदी किनारे घर बनाना शुरू कर दिए ये भी नुकसान का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आया है. हिमाचल प्रदेश के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी का कहना है कि 'नदी और नालों से 100 मीटर से अधिक दूरी पर मकान बनाने के लिए कानून बनाया जाएगा, जिसके विधानसभा में बिल लाया जाएगा. इसके पास होते ही नदी और नालों के समीप मकान बनाने को लेकर कानून की सख्ती के साथ पालना की जाएगी.'

डॉ. सुरेश अत्री ने कहा कि 'आम जनता को भी समझना होगा कि जब भी वो अपना नया घर प्लान करें तो वहां की मिट्टी की जांच जरूर कराएं. नदी नालों से निर्माण 100 से 200 मीटर की दूरी परी होना चाहिए. यानी बाढ़ के हाई पीएच लेबल से दूरी पर ही भवनों का निर्माण किया जाए। ये सबके लिए अच्छा रहेगा.'

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