कैसी थी वो भयानक दिन और रात जहां दुबे थे आंखों के सामने अपने, सुने उन्हीं कि जुबानी

हिमाचल क्राइम न्यूज़ 
मंडी। आयुष सूर्यवंशी 


मंडी जिले में मानसून का सबसे ज्यादा कहर देखने को मिला है. मंडी जिले में जगह-जगह भारी बारिश, बादल फटने और फ्लैश फ्लड के चलते तबाही का मंजर देखने को मिल रहा है. जिले के हर कोने से तबाही की कहानियां निकल कर सामने आ रही हैं. ऐसी ही एक मार्मिक कहानी मंडी जिले के गोहर उपमडल के स्यांज पंचायत के पंगल्यूर गांव से भी सामने आई है. यहां 9 लोग खड्ड में आयी भंयकर बाढ़ में बह गए. ऐसे ही उपमंडल धर्मपुर के तहत आने वाली वाली ग्राम पंचायत लौंगणी का स्याठी गांव भी भीषण त्रासदी की भेंट चढ़ गया.

बाढ़ में फसने पर फोन पर मांगते रहे मदद
30 जून और 1 जुलाई की रात को पंगल्यूर गांव में दो मकानों और मवेशियों सहित 9 लोग छोटी सी खड्ड में आयी भंयकर बाढ़ से जलमग्न हो रहे थे. इन लोगों द्वारा लगातार फोन के जरिए मदद मांगी जा रही थी. सामने 100 मीटर की दूरी पर बड़े भाई का परिवार और पीछे गांव के अन्य लोग मदद करने के लिए तैयार भी थे, लेकिन मददगारों को भी बाढ़ ने इतना वेबस कर दिया था कि चाहकर भी यह लोग कुछ नहीं कर पाए और 9 लोग इस बाढ़ में बह गए.

4 के शव बरामद, 9 अभी भी लापता
पंगल्यूर गांव में आई इस त्रासदी की 9 लोग बह गए. जिनमें से अभी तक 4 लोगों के ही शव बरामद हुए हैं. जबकि बाकी 5 लापता लोगों का अभी तक कोई सुराग नहीं लग पाया है. इन 9 लोगों में से एक मकान में 75 वर्षीय पदम देव और उनकी 70 वर्षीय धर्मपत्नी देवकू देवी रह रही थी. जबकि दूसरा मकान 50 वर्षीय झाबे राम का था, जो परिवार के 6 अन्य सदस्यों सहित यहां रह रहा था.

तबाही को अपनी आंखों से देखने वाली पंगल्यूर निवासी कुशमा देवी ने बताया, "30 जून की रात को भारी बारिश हो रही थी, जिससे पूरे क्षेत्र में बिजली चली गई थी. झाबे राम के मकान से कुछ दूरी पर मेरा मकान है. उस रात 1 बजकर 35 मिनट पर झाबे राम की बहु उमावती का उन्हें फोन आता है कि उनके मकान को चारों ओर से बाढ़ ने घेर लिया है. पहले तो हमें उमावती की बात पर यकीन नहीं हुआ, क्योंकि सकोली खड्ड में इतना पानी कभी भी नहीं आता था. जिसके बाद वे लाइट लेकर जब बरामदे में आयी और देखा की छोटी सी खड्ड ने भंयकर रूप धारण कर लिया है. साथ के घर में रहने वाले बुजुर्ग दंपत्ति भी उस समय झाबे राम के घर पहुंच गए थे और घर की छत्त पर खड़े होकर सबसे मदद मांग रहे थे. जिसके बाद वो अपने पति के साथ उनकी मदद के लिए दौड़ती है. 1 बजकर 42 मिनट पर एक बार फिर उमावती का फोन आता है और वो यही कहती रही की आज वो नहीं बचने वाले हैं. 1 बजकर 55 मिनट तक उमावती के फोन से लगातार चिल्लाने की आवाज आती रही. जिसके बाद सामने सिर्फ पानी के अलावा और कुछ नहीं दिखाई दे रहा था."

'चाहकर भी अपनों को न बचा पाए'
वहीं, झाबे राम के बड़े भाई धमेश्वर ने बताया कि उस रात वे काम के सिलसिले में काजा गए हुए थे. जब उनके छोटे भाई के घर में बाढ़ आई तो वे फोन के जरिए सबका कुशलक्षेम जानते रहे. कुछ देर बाद उन्हें पता चला कि पानी कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है और खड्ड ने पूरे मकान को अपनी चपेट में लिया है. जिसके बाद वहां सब कुछ तबाह हो गया. खड्ड के इस सैलाब के सामने उस समय ग्रामीण और उनका परिवार पूरी तरह से बेबस था और चाहकर भी अपनों को नहीं बचा पाए.

"मेरे छोटे भाई के अलावा बाढ़ में बह चुके घर में मेरी माता सुरमि देवी, भाई झाबे राम की पत्नी पार्वती देवी, बेटा इंद्रदेव, बहू उमावती, 9 वर्षीय पोती कनिका और 7 वर्षीय पोता रहते थे. जिनमें से अभी तक भाभी पार्वती देवी, भतीजे इंद्रदेव, पोती कनिका का ही शव बरामद हो सका है. झाबे राम के परिवार से उनकी बेटी हेमलता ही बची है, जिसकी उन्होंने कुछ साल पहले शादी कर दी थी." - धमेश्वर, आपदा प्रभावित व झाबे राम का बड़ा भाई


स्कोली खड्ड ने गांव पर बरपाया कहर
स्कोली खड्ड के इस सैलाब में कुल चार मकान, गौशालाएं और कई घराट बहकर चले गए हैं. इसके अलावा खड्ड ने कई बीघा जमीन के साथ पैदल पुलिया का भी नामोनिशान मिटा दिया है. ग्रामीणों का कहना है कि पंगल्यूर गांव की आबादी खड्ड के आर पार बसती है. पैदल पुलिया टूटने से उन्हें खड्ड से होकर आना जाना पड़ रहा है. वहीं, यहां से कुछ दूरी पर ज्यूणी खड्ड पर बना पुल 2023 की आपदा में पहले ही बह चुका है. प्रभावित परिवारों ने सरकार व प्रशासन ने स्कोली खड्ड़ पर से आर-पार जाने के लिए पैदल पुलिया बनाने की मांग उठाई है. साथ ही इन्होंने ज्यूणी खड्ड पर पुल और कच्ची सड़क को पक्का करने की भी मांग उठाई है.



स्याठी गांव में तबाही का मंजर
30 जून की रात आई आपदा के कारण एक ही रात में पूरा स्याठी गांव खाली हो गया. आपदा में 5 घर पूरी तरह से जमींदोज हो गए हैं. जबकि बाकी घर रहने लायक नहीं बचे हैं. ऐसे में आपदा की मार झेल रहे स्याठी गांव के लोगों ने नैणा माता मंदिर में शरण ली है. अब ये लोग बच्चों और बुजुर्गों के साथ मंदिर प्रांगण में रहने को मजबूर हैं. 2025 की आपदा से एक दशक पहले भी स्याठी गांव की धरती डगमगाई थी. तब भी ग्रामीण इसी मंदिर में 15 दिन के लिए ठहरे थे. लौंगणी पंचायत की प्रधान मीना देवी ने बताया, "वर्ष 2014 में भी स्याठी गांव की धरती भारी बारिश के कारण खिसकी थी. बाद में हालात सामान्य होने पर सभी अपने घरों की तरफ चले गए थे."

"कुछ साल पहले मेरा परिवार आईआरडीपी में था. उसके तहत मिले पैसों और अपने पास रखी जमापूंजी से घर बनाया था. उसके बाद पाई-पाई जोड़कर उस घर का विस्तार किया था. मगर एक झटके में ही सब कुछ चला गया. कुछ भी बाकी नहीं बचा है." - अभिषेक कुमार, आपदा प्रभावित

आपदा प्रभावितों की सरकार से मांग
प्रभावित सुनीता और मीना देवी ने बताया कि बच्चों और बुजुर्गों के साथ मंदिर के प्रांगण में रहना मुश्किल हो रहा है. खाने के लिए तो सब कुछ मिल रहा है, मगर सिर पर छत नहीं है. उन्होंने सरकार से गुहार लगाई है कि जल्द से जल्द उन्हें जमीन मुहैया करवाई जाए, ताकि घर बनाकर वो फिर से नई जिंदगी की शुरुआत कर सकें.

हर ओर नजर आ रही बस चट्टानें
स्याठी गांव में हुए भारी लैंड्स्लाइड के बाद गिरे मलबे की तरफ नजर दौड़ाएं तो यहां चारों तरफ पत्थर ही पत्थर नजर आ रहे हैं. ग्रामीणों ने बताया कि उनके घरों की नींव मजबूत पत्थरों पर टिकी हुई थी. जहां से पहाड़ी कटी है और फिर मलबे में तबदील हुई है वहां भी चट्टानें साफ तौर पर नजर आ रही हैं. यहां पर विशालकाय चट्टान का एक हिस्सा कटकर ढह गया और गांव में ये तबाही हुई है.

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