क्या सुक्खू सरकार मंदिरों का पैसा अपनी योजनाओं में खर्च कर सकती है? क्या ऐसा कोई नियम होता है ?

हिमाचल क्राइम न्यूज़ 

शिमला। एक्सपर्ट डेस्क / वेब डेस्क

 


हिमाचल में सरकारी योजनाओं के लिए मंदिरों का पैसा लेने का मुद्दा गूंज रहा है. यहां जानिए क्या सरकार मंदिरों से पैसा ले सकती है?क्या कोई राज्य सरकार मंदिर ट्रस्ट से मिलने वाले पैसे को सरकारी योजनाओं पर खर्च कर सकती है? इन दिनों ये सवाल हिमाचल प्रदेश की वादियों में गूंज रहा है. दरअसल सुक्खू सरकार ने प्रदेश में मंदिरों को लेकर एक नया फरमान जारी किया है. जिसमें सीएम सुक्खू द्वारा शुरू की गई सुख आश्रय योजना के लिए हिमाचल के मंदिरों से पैसे देने को लेकर 10 जिलों की डीसी को पत्र लिखा गया है. जिसको लेकर अब विपक्ष हमलावर है. भाजपा द्वारा सरकार से ये फैसला वापस लेने की मांग की जा रही है।


हिमाचल में सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू की महत्वकांक्षी योजनाओं को अंशदान देने के लिए भाषा एवं संस्कृति विभाग के सचिव राकेश कंवर जो सरकार के संचालन में चल रहे मंदिरों के चीफ कमिश्नर भी हैं, उनकी तरफ से कुल्लू और किन्नौर को छोड़कर 10 जिलों के डीसी, जो संबंधित जिलों में टेंपल कमिश्नर हैं को एक लेटर जारी हुआ है. जिसमें हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने दो सरकारी योजनाओं 'मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना' और 'मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना' में योगदान देने के लिए पैसा मांगा है।


इस चिट्ठी के सार्वजनिक होने पर हिमाचल में इन दिनों सियासी उबाल आ गया है. इन सरकारी योजनाओं के लिए मंदिरों से पैसा मांगने पर अब हिमाचल की कांग्रेस सरकार और विपक्षी दल बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं. पत्र सामने आने के बाद नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर निशाना साधा है. वहीं, इस मामले को लेकर प्रदेश भर के लोगों के बीच भी चर्चाओं का बाजार गर्म है. ईटीवी भारत ने भाषा एवं संस्कृति विभाग से सेवानिवृत्त हुए अधिकारियों और अन्य जानकारों से सरकार की इस चिट्ठी को लेकर बात की है.


क्या नियमों में है सरकारी योजनाओं के लिए पैसा मांगने का प्रावधान?

एक मीडिया संस्थान ईटीवी से बात करते हुए भाषा एवं संस्कृति विभाग के पूर्व में रहे निदेशक एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्रीनिवास जोशी ने बताया, "नियमों में सरकार की विकासात्मक योजनाओं को चलाने के लिए मंदिरों से पैसा मांगने का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन समाज के कल्याण के उपयोग के लिए पैसे मांगने में कोई बुराई भी नहीं है." सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्रीनिवास जोशी ने कहा कि 'मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना' और 'मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना' समाज के कमजोर वर्गों के लिए शुरू की गई कल्याणकारी योजनाएं हैं. जिसमें सुख आश्रय योजना के तहत सरकार ने बिना माता-पिता के बच्चों को गोद लिया है. जिनकी देखभाल का जिम्मा अब सरकार के कंधों पर है. इसी तरह से सरकार ने विधवाओं, निराश्रित महिलाओं, तलाकशुदा महिलाओं और विकलांग माता-पिता के बच्चों की शिक्षा और कल्याण के लिए मंदिरों से योगदान मांगा है.


श्रीनिवास जोशी ने कहा कि सरकार की चिट्ठी में इन योजनाओं के योगदान के लिए कहीं पर भी आदेशों का जिक्र नहीं है. सरकार की तरफ से केवल कल्याण की इन योजनाओं में योगदान देने के लिए मंदिरों से अंशदान की अपील की गई है. अब ये मंदिर ट्रस्ट पर निर्भर करता है कि वे इन योजनाओं में सहयोग करते हैं या नहीं. वैसे भी मंदिर धन की उपलब्धता के हिसाब से समाज कल्याण के कार्य करते आए हैं. मंदिर गरीब बेटियों की शादियों, अस्पताल निर्माण और गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए हमेशा सहयोग करते रहे हैं. ऐसे में इस तरह के कल्याणकारी योजनाओं के लिए मंदिरों से अंशदान के लिए आग्रह करना कोई गलत नहीं है.


सरकार ने आदेश दिया या आग्रह किया?

भाषा एवं संस्कृति विभाग से सेवानिवृत हुए अधिकारी सुदर्शन वशिष्ठ ने बताया कि सरकार द्वारा मंदिरों के पैसे को विकास कार्यों पर खर्च करने का प्रावधान नहीं है, लेकिन गरीब वर्गों के कल्याण के लिए मंदिरों से सहयोग की अपील करने में कुछ भी गलत नहीं है. उन्होंने कहा कि मंदिरों के पैसे को मंदिरों के विकास पर खर्च किया जाता है, लेकिन मंदिर ट्रस्ट अपने स्तर पर भी गरीब कन्याओं के विवाह, गौ सेवा, गरीब बच्चों की शिक्षा सहित समाज के कल्याण पर पैसा खर्च करते हैं. वहीं, प्रदेश सरकार ने भी अपनी इसी तरह की दो कल्याणकारी योजनाओं में अंशदान का आग्रह किया है, न की आदेश दिया है.



कोविड काल में मंदिरों ट्रस्ट ने खुद दिया था सहयोग

"सरकार ने विकास कार्यों के लिए पैसा नहीं मांगा है और न ही वेतन और पेंशन के लिए मंदिरों से सहयोग की अपील की गई है. भाषा एवं संस्कृति विभाग ने अपनी चिट्ठी में मंदिर ट्रस्टों से समाज की कल्याण की लिए शुरू की गई दो योजनाओं में योगदान देने की अपील की है. इसमें कोई बुराई नहीं है. ये पैसा अनाथ बच्चों की देखभाल और शिक्षा पर खर्च होना है. वहीं, ये पैसा ऐसे बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाना है. जो विधवा महिलाएं और गरीब महिलाएं बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है. सरकार ने किसी भी मंदिर ट्रस्ट की जबरदस्ती करके पैसे नहीं मांगा है. केवल अंशदान की अपील की गई है. अब ये मंदिर ट्रस्ट पर है कि वे सरकार की अपील पर क्या निर्णय लेते हैं? कोविड काल के दौर में भी मंदिर ट्रस्टों ने खुद आगे आकर सरकार को उस कठिन दौर से बाहर निकलने के लिए अपने खजाने खोल दिए थे." - एमपीएस राणा, वरिष्ठ पत्रकार



चिट्ठी में सरकार ने मंदिर ट्रस्टों से क्या अपील की है?

हिमाचल प्रदेश हिंदू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1984 के तहत राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न मंदिर ट्रस्ट धर्मार्थ गतिविधियों और कल्याणकारी योजना के लिए योगदान देते रहते हैं. इस प्रकार का दान करते समय मंदिर ट्रस्ट उपरोक्त कल्याणकारी योजनाओं के लिए निधि उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना/कोष के साथ-साथ मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना/कोष में भी अंशदान कर सकते हैं. इन योजनाओं/कोषों में अंशदान करने के लिए सरकार की चिट्ठी में दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं. जिनका सभी मंदिर ट्रस्टों द्वारा पालन करना होगा. इसमें अंशदान करते समय प्रस्ताव को पहले ट्रस्ट की तरफ से अपनी बैठक में पारित करना होगा. इसी तरह से सरकार ने अधिनियम की धारा 17 और 17 (ए) से (डी) के प्रावधानों का सख्ती से पालना करने के भी निर्देश दिए हैं. वहीं, सरकार ने अपने पत्र में सभी मामलों में अतिरिक्त मुख्य आयुक्त (मंदिर)-सह-निदेशक, भाषा, कला एवं संस्कृति के जरिए मामला भेजकर मुख्य आयुक्त मंदिर की पूर्व स्वीकृति लेने के भी निर्देश दिए हैं. हालांकि मंदिर ट्रस्ट कन्याओं की शादी, गौ सेवा और अन्य कल्याण के कार्य के लिए अपने स्तर पर नियमों के तहत पैसा देते रहे हैं, लेकिन अगर मंदिर सरकार को अंशदान देना चाहते हैं तो उनको इन्हीं नियमों की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।


विपक्ष ने उठाए सवाल

पत्र सामने आने के बाद नेता विपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर निशाना साधा है. जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। हिमाचल में सरकार के नियंत्रण में 36 मंदिर हैं और सरकार चाहती है कि इन मंदिरों और ट्रस्ट का पैसा सरकार के खजाने में जमा किया जाए, ताकि हिमाचल सरकार की दो योजनाओं को चलाने में खर्च हो सके. इसे लेकर सरकार के एक विभाग के सचिव ने जिला उपायुक्तों को चिट्ठी लिखी है. ये दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि किसी भी सरकार ने मंदिर और ट्रस्ट का पैसा सरकारी योजनाओं के लिए नहीं लिया है. आपदा के समय मंदिर या ट्रस्ट का पैसा लिया जाता है या गरीबों के इलाज के लिए ऐसा किया जा सकता है, लेकिन अपनी योजनाओं के लिए पैसा मांगना विचित्र फैसला है. हम इस फैसले का विरोध करेंगे और सभी को इसका विरोध करना चाहिए." - जयराम ठाकुर, नेता प्रतिपक्ष


मामले पर मुख्यमंत्री की सफाई

हालांकि, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विपक्ष के इस तरह के आरोपों को नकारते हुए जयराम ठाकुर पर पलटवार किया है। मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना के लिए सरकार की ओर से बजट रखा गया है. इसके लिए मंदिरों का पैसा देने की बात नहीं कही गई है. अगर किसी बच्चे की मेडिकल कॉलेज की फीस भरनी है तो उसके डॉक्यूमेंटेशन की फॉर्मेलिटी शिमला आती है. हमने जिला उपायुक्तों से कहा है कि ऐसे बच्चों की फीस भर दें, ताकि उसकी एडमिशन कैंसिल ना हो. इस योजना के लिए बकायदा बजट रखा गया है और कानूनी रूप दिया गया है. जयराम ठाकुर को अच्छी योजनाओं में योगदान देना चाहिए" - सुखविंदर सिंह सुक्खू, मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश


'मंदिरों से पैसा लेने में गलत क्या है?'

हिमाचल सरकार के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि "सुख आश्रय योजना हमारा कोई चुनावी वादा नहीं था. उसके लिए मंदिर से फंड की बात की जा रही है तो उसमें क्या गलत है? जयराम ठाकुर जब मुख्यमंत्री थे तो कोविड के दौरान मंदिरों से पैसा लिया गया था, उस समय जयराम ठाकुर को ये याद नहीं आया. जयराम ठाकुर सिर्फ गुमराह करते हैं, प्रदेश हित में कोई बात नहीं करते."


'सरकार ने किसी मंदिर का पैसा नहीं लिया'

"मंदिरों का जीर्णोद्धार करने के लिए सरकारी कोष से पैसा उपलब्ध करवाया जाता है. सरकार ने किसी मंदिर का पैसा नहीं लिया है और न ही भविष्य में मंदिर से पैसा लेने का कोई विचार है. कुछ विकृत मानसिकता वाले लोग इस तरह की गलत धारणा को फैला रहे हैं." - मुकेश अग्निहोत्री, डिप्टी सीएम


क्या है 'मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना'?

हिमाचल में 'मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना' सुखविंदर सिंह सुक्खू की महत्वाकांक्षी योजना है. साल 2022 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद प्रदेश के अनाथ बच्चों के लिए वर्ष 2023 में योजना की शुरुआत की गई थी. जिसके तहत प्रदेश में जिन बच्चों के माता-पिता नहीं है. ऐसे बच्चों को मुख्यमंत्री सुख-आश्रय योजना के तहत सरकार ने "चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट" का दर्जा दिया गया है. इस योजना के तहत प्रदेश के 6000 अनाथ बच्चों की देखभाल से लेकर पढ़ाई तक का जिम्मा हिमाचल सरकार को उठाना है. इस योजना के तहत इन बच्चों की शिक्षा के खर्च से लेकर 4 हजार रुपये मासिक जेब खर्च और एजुकेशनल टूर पर भेजने से लेकर हायर स्टडीज का खर्च भी सरकार उठाएगी. वहीं छात्रावास उपलब्ध न होने पर पीजी खर्च के लिए 3,000 रुपये उपलब्ध कराएगी. इसके साथ ही पढ़ाई, बिजनेस और स्टार्टअप के लिए 2 लाख तक की रकम देने का प्रावधान है. इसी के साथ घर बनाने के लिए 3 लाख और शादी करने के लिए 2 लाख रुपए तक की सहायता देने का भी प्रावधान है.


'मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना' क्या है ?

हिमाचल में विधवाओं, निराश्रित महिलाओं, तलाकशुदा महिलाओं और विकलांग माता-पिता के बच्चों की शिक्षा और कल्याण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए कांग्रेस सरकार ने 'मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना' शुरू की है. जिसकी अधिसूचना 3 सितंबर 2024 को जारी की गई थी. योजना का मुख्य उद्देश्य पात्र महिलाओं और दिव्यांग माता-पिता के 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी खर्चों को पूरा करने के लिए 1000 रुपये का मासिक अनुदान प्रदान करना है. इसके अलावा ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, डिप्लोमा या अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने वाले बच्चों के ट्यूशन और छात्रावास का खर्च भी सरकार उठाएगी।


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