पौंग बांध विस्थापितों के ‘दर्द’ की सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट तैयार, क्या है मामला, जाने फुल डिटेल

हिमाचल क्राइम न्यूज़
 नई दिल्ली/शिमला। डेस्क


हिमाचल प्रदेश के पौंग बांध विस्थापितों के पांच दशक से सुलग रहे केसों की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश केएम जोसेफ व बीवी नागराथन की खंड पीठ ने भारत सरकार, राजस्थान, हिमाचल सरकार, हाई पावर कमेटी और ब्यास कंस्ट्रक्शन बोर्ड को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब दाखिल करने का आदेश पारित किया है। सिविल रिट पिटीशन नंबर 223/2023 मनोहर लाल कौंडल, हंसराज चौधरी, बिशंबर सिंह प्रागोतडा, कुलदीप शर्मा, प्यारेलाल, रविंद्र कुमार व हुकुमचंद बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान आदि मामलों में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विनोद शर्मा व अमित आनंद तिवारी ने कोर्ट में दलील रखी कि पोंग बांध विस्थापित अपने पुनर्वास के लिए पिछले पांच दशक से इंतजार कर रहे हैं। बहुत सारे लोग पुनर्वास की आस में इस संसार को छोडक़र चले गए और अब उनके बच्चे इस लड़ाई को हिमाचल से राजस्थान तक एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में व एक विभाग से दूसरे विभाग में भटकते हुए हजारों रुपए और कई साल बर्बाद कर चुके हैं। हालांकि सरकारों और विभागों का उदासीन रवैया होने के कारण पुनर्वास योजना को अभी तक अमलीजामा नहीं पहनाया गया है। अत: याचिकाकर्ता के भारत के संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार व संपति का अधिकार का उलंघन हुआ है। अत: इन परिस्थितियों में हमें देश के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।

पौंग बांध विस्थापितों ने हिमाचल हाई कोर्ट के आदेशों के अनुसार कई बार इंदिरा गांधी नहर परियोजना के प्रथम चरण में आबंटित भूमि में कब्जा देने की गुहार लगाई, लेकिन आज तक उसका कोई हल नहीं निकला। भूमि अधिग्रहण के बाद जैसे ही 1972 में पुनर्वास योजना प्रारंभ हुई, तब राजस्थान सरकार ने आश्वासन दिया था, जो प्रदेश इस बांध के बनने का सबसे ज्यादा लाभार्थी था, कि सभी पौंग बांध विस्थापितों को राजस्थान में ऐसी जगह पुनर्वास किया जाएगा, जहां रहने और खेती लायक सभी सुविधाएं जैसे स्कूल, अस्पताल, रोड व सिंचाई के लिए पानी आदि की सुविधा होगी, लेकिन पुनर्वास योजना की शुरुआत में ही राजस्थान सरकार ने बेतुके 1972 नियम बनाकर हजारों पौंग विस्थापितों का भूमि आबंटन निरस्त कर दिया, जिसको बाद में इसी कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया। इस कार्य को दुरुस्त करने के लिए हाई पावर कमेटी का गठन किया गया, जिसकी 1996 से लेकर अभी तक 26 मीटिंग्स हो चुकी हैं, लेकिन न तो यह कार्य पूरा हो पाया और न ही पौंग विस्थापितों की समस्याओं का हल हो पाया। उलटा बहुत सारा भूमि आबंटन बॉर्डर एरिया में किया गया, जहां रेत के टीले हैं, सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है। इसलिए वहां न तो रहना मुमकिन है और न ही खेती करना मुमकिन है। अत: याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह अपनी निगरानी में राजस्थान में आरक्षित भूमि पर पुनर्वास या मुआवजा दिलवाए व पौंग बांध विस्थापितों के भूमि आबंटन मामले का निपटारा करे, तभी इस समस्या का स्थायी समाधान निकल पाएगा अन्यथा यह और कई दशकों तक हल होने वाला नहीं है।

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