आज का शब्द: विशृंखल और हरिवंशराय बच्चन की कविता- आ, सोने से पहले गा लें !
हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- विशृंखल, जिसका अर्थ है- जिसमें शृंखला न हो या न रह गई हो, बिखरा हुआ। प्रस्तुत है हरिवंशराय बच्चन की कविता- आ, सोने से पहले गा लें !
आ, सोने से पहले गा लें !
जग में प्रात पुनः आएगा,
सोया जाग नहीं पाएगा,
आँख मूँद लेने से पहले, आ, जो कुछ कहना कह डालें !
आ, सोने से पहले गा लें !
दिन में पथ पर था उजियाला,
फैली थी किरणों की माला
अब अँधियाला देश मिला है, आ, रागों का दीप जला लें !
आ, सोने से पहले गा लें !
काल-प्रहारों से उच्छृंखल,
जीवन की लड़ियाँ विशृंखल,
इन्हें जोड़ने को, आ, अपने गीतों की हम गाँठ लगा लें !
आ, सोने से पहले गा लें !
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