अंतरजातीय विवाह पर हिमाचल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, इंटरकास्ट मैरिज के विरोध को बताया आध्यात्मिक और धार्मिक अज्ञानता

हिमाचल क्राइम न्यूज़

शिमला। लीगल संवाददाता




 अंतरजातीय विवाह (Inter Caste Marriage) को लेकर हिमाचल हाईकोर्ट (Himachal High Court) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. एक अंतरजातीय विवाह के मामाले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुये कहा कि आध्यात्मिक और धार्मिक अज्ञानता के चलते कुछ लोग इंटर कास्ट मैरिज का विरोध करते हैं, जबकि शादी करने का फैसला केवल दो बालिग लोगों का निजी निर्णय होता है.


हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा अपने आदेश में श्रीमदभागवद गीता और वेद से लेकर भारतीय इतिहास में हुए अंतरजातीय विवाह और संविधान में दिए गए अधिकारों को जिक्र किया है. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राकेश चौहान ने जानकारी दी कि इस संबंध में हैबियस कॉर्पस पिटिशन दायर की गई थी. उच्च न्यायलय ने जातिगत भेदभाव के चलते अपने ही परिजनों द्वारा लड़की को बंधक बनाए जाने के आरोपों को लेकर दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए लड़की की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और दोनों को जरूरी सुरक्षा देने का आदेश दिया.

अधिवक्ता ने बताया कि याचिकाकर्ता युवक का आरोप था कि वह जिस लड़की के साथ विवाह करना चाहता है, उसे उसके परिवारवालों ने बंधक बना कर रखा है. याचिकाकर्ता ने लड़की को कोर्ट में बुलाकर उसकी इच्छा जानने की गुहार लगाई गई थी. आरोप लगाया था कि जातिगत और आर्थिक कारणों से लड़की के परिवार वाले शादी के खिलाफ हैं. याचिका पर सभी पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जातिवाद के कारण अंतरजातीय विवाह का विरोध करना आध्यात्मिक और धार्मिक अज्ञानता का परिणाम है.
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भारतीय परंपराओं का मौलिक रूप है स्वतंत्र विचार. अदालत ने कहा कि कुछ लोग धर्म के नाम पर  जातिगत भिन्नता को बनाए रखने के पक्षधर हैं और भेदभाव को जारी रखना चाहते हैं, लेकिन वे अज्ञानता के कारण ऐसा करते हैं, क्योंकि ऐसी सोच धर्म के आधार सच्चे सार के विरुद्ध है. हर धर्म का आध्यात्मिक आधार और धार्मिक संदेश है कि संसार में सभी प्राणी एक समान हैं. जाति, लिंग, रंग, पंथ, वर्ग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए. अदालत ने श्रीमदभगवत गीता के सार का भी जिक्र किया. साथ ही कहा कि शादी करना या न करना और शादी के लिए अपनी इच्छा से साथी चुनने का अधिकार हमारे भारतीय समाज में पुरातन काल से मान्यता प्राप्त अधिकार है.

कोर्ट ने सत्यवती और शांतनु विवाह का दिया उदाहरण

कोर्ट ने सत्यवती और शांतनु,  दुष्यंत और शकुंतला के विवाह का भी उदाहरण दिया. राजकुमारी सावित्री और लकड़हारे सत्यवान के अलावा देवहूती औप ऋषि करद्म से विवाह का भी जिक्र किया. कालिदास और विद्योत्तमा, सती और भगवान शिव, श्रीकृष्ण रुक्मिणि के विवाह का भी जिक्र किया. कोर्ट ने अपने आदेश में ये भी साफ किया कि इतिहास और पुरातन मूल्यों को न भी मानें तो भी हमारा संविधान इच्छानुसार विवाह की इजाजत देता है.



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