Shimla:डीसी आफिस परिसर में बिना टैण्डर के ही ठेकेदार को मिल गया लाखों का काम

 हिमाचल क्राइम न्यूज़ 

शिमला। ब्यूरो


 इन दिनों जिलाधीश शिमला के परिसर में स्थित एसडीएम शहरी के कार्यालय में बना बाथरूम और कार्यालय में हुई पैनलिंग को लेकर चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। यह चर्चाएं इसलिये हैं क्योंकि इस कार्य के लिये कोई निविदायें आदि मांगने की औपचारिकता तक नहीं की गयी है। यहां तक चर्चा है कि इस काम पर कितना खर्च होगा इसका भी कोई ऐस्टीमेट काम शुरू करने से पहले तैयार नहीं किया गया। चर्चा है कि इस कार्य को करने वाले ठेकेदार की पहुंच के आगे संबधित प्रशासन को यह औपचारिकताएं कार्य शुरू होने से पहले पूरी करवाने का समय ही नहीं मिल पाया। शायद प्रशासन पर ठेकेदार को तुरन्त प्रभाव से कोई काम देने का दबाव था। क्योंकि ठेकेदार नगर निगम शिमला का सरकार द्वारा मनोनित एक पार्षद था। स्वभाविक है कि ऐसा मनोनयन उसी को मिलेगा जिसका ऊपर तक अच्छा रसूख होगा।

इस रसूख के कारण प्रशासन को काम देना पड़ा। इस कार्य में वही कहावत चरितार्थ हुई कि ‘‘आप मुझे बैठने मात्र की जगह दो और उसे सोने तक मैं स्वयं बना लूगां’’। साहब को बाथरूम मेें कुछ रिपेयर करने का काम दिया गया और जनाब ने उसी को बढ़ाकर एसडीएम का कमरा भी उसी में शामिल कर लिया। फिर जब बिना औपचारिकताओं के काम मिल गया हो तो उसका बिल भी अपनी ईच्छानुसार ही बनाया जायेगा। साहब ने इसी नियम पर चलते हुए नौ लाख से भी अधिक का बिल प्रशासन को थमा दिया। प्रशासन के पास शायद इस काम के लिये इतना बजट प्रावधान ही नहीं था। पैमेन्ट न होने पर एफसी रैवन्यू तक मामला जा पहुंचा। एफसी ने मामला डीसी शिमला को भेज दिया। डीसी ने भी जैसे मामला एफसी से आया वैसे ही उसे एसडीएम को भेज दिया। एस डी एम शायद साढ़े तीन लाख की ही पैमैन्ट कर पायी है चर्चा तो यहां तक है कि इसी मामले के कारण एसडीएम का यहां से तबदला हुआ है।
यह सब शिमला में घटा है। सरकार में कोई भी खरीद की जानी हो या किसी भी तरह का निर्माण/रिपेयर आदि का काम किया जाना हो तो उसका बजट में वाकायदा प्रावधान किया जाता है। बजट की उपलब्धता के बाद खर्च का अनुमान तैयार किया जाता है। इसके बाद टैण्डर/ कोटेशन आमन्त्रित किये जाते हैं और न्यूनतम आफर देने वाले को काम आवंटित किया जाता है। जहां यह सारी औपचारिकताएं पूरी नहीं की जाती है उसे भ्रष्टाचार की संज्ञा दी जाती है। ऐसे भ्रष्टाचार के लिये संवद्ध लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करके कारवाई की जाती है। इस मामले में संवद्ध प्रशासन ने यह पुष्टि की है कि इसमें यह औपचारिकताएं पूरी नहीं की गयी है। यह मामला डीसी और एफसी दोनों के संज्ञान में रहा है। लेकिन किसी भी अधिकारी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि इस कार्य के लिये बजट प्रावधान था या नहीं। क्योंकि बजट प्रावधान होने की स्थिति में मामला एफसी तक जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। यह भी जानने का प्रयास नहीं किया गया कि यह काम करवाना एसडीएम के अधिकार क्षेत्र का था भी या नहीं। स्वभाविक है कि सभी ने ‘‘पार्षद के ठेकेदार होने’’ के प्रभाव में ही इन सारे पक्षों की ओर ध्यान नहीं दिया है।
यहां पर यह महत्वपूर्ण है कि यदि राजधानी में ही इस तरह से काम हो रहे हैं तो फिर फील्ड में क्या कुछ हो रहा होगा। सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टालरैन्स के दावे करती है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि इस मामले में कोई जांच करवाई की जाती है या नहीं। यह काम एसडीएम कार्यालय में नीरजा चांदला के कार्यकाल में हुआ है।

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