नेहरू के कहने पर छोड़ी थी तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग:दलाई लामा
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| His Holiness The14th Dalai Lama |
हिमाचल क्राइम न्यूज़ || ब्यूरो धर्मशाला || 84 वर्षीय 14वें बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा को वर्ष 1959 में 10 से 17 मार्च तक के सात दिन नहीं भूले हैं। 10 से 17 मार्च के दौरान सात दिन में दलाईलामा ने जिंदगी और मौत के फासले को बेहद करीब से देखा था। वर्ष 1959 में 17 मार्च की रात ऐसा वाकया हुआ कि दलाईलामा को तिब्बत से भागने की नौबत आ गई। मैकलोडगंज स्थित अपने आवास पर ‘अमर उजाला’ को दिए विशेष साक्षात्कार के दौरान दलाईलामा ने अपनी जुबानी 70 वर्षों के संघर्ष की दास्तां सुनाई।
16 मार्च को हमें पता लगा कि हथियारों से लेस चीन सेना की बड़ी टुकड़ी पोटाला महल के पास कैंप लगाए हुए थी। ‘मुझे चीन सेना की ओर से संदेश आया कि जहां आपका घर है, वह कमरा मार्क कर दो, ताकि हम आपको सुरक्षा दे सकें।
तिब्बत को इसलिए लिया छोड़ने का फैसला
इसके बाद हम संशय में पड़ गए कि क्या हमें सुरक्षा देने के लिए कमरे को चिह्नित किया गया या हमें टारगेट करने के लिए। फिर हमने तय किया अब यही समय है तिब्बत को छोड़ने का।
17 मार्च रात 10 बजे मैं नौरबलिंगा से यह सोचकर निकल आया कि अब पता नहीं अगली सुबह को मैं देख पाऊंगा या नहीं। अगली सुबह मैं एक दर्रे पर पहुंचा। यहां मैंने खुद को सुरक्षित महसूस किया।’ उन्होंने बताया कि यहां से उन्हें आखिरी बार पोटाला महल और लहासा दिखा।
दक्षिण तिब्बत पहुंच कर उन्होंने सोचा कि शायद वे एक बार फिर से यहां पर रुक कर चीन सरकार से बातचीत करते हैं, लेकिन 20 मार्च को चीन सेना ने पोटाला महल पर बमबारी कर दी।
उन्हें एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि उनके महल के कमरे से एक बम भी मिला था। इसके बाद तय किया कि अब मैं भारत में शरण लूंगा। यहां तिब्बती समुदाय को बसाने और संस्कृति को सहेजने में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बहुत मदद की। दलाईलामा वर्ष 1959 में 24 वर्ष की आयु में भारत आए थे।
दक्षिण तिब्बत पहुंच कर उन्होंने सोचा कि शायद वे एक बार फिर से यहां पर रुक कर चीन सरकार से बातचीत करते हैं, लेकिन 20 मार्च को चीन सेना ने पोटाला महल पर बमबारी कर दी।
उन्हें एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि उनके महल के कमरे से एक बम भी मिला था। इसके बाद तय किया कि अब मैं भारत में शरण लूंगा। यहां तिब्बती समुदाय को बसाने और संस्कृति को सहेजने में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बहुत मदद की। दलाईलामा वर्ष 1959 में 24 वर्ष की आयु में भारत आए थे।
दलाईलामा ने कहा कि वर्ष 1956 में चीन जाने के बाद इसी वर्ष भारत आकर मैंने पंडित जवाहर लाल नेहरू से चीन सरकार की दमनकारी नीतियों की शिकायत की थी। नेहरू के समक्ष इसी वर्ष भारत में रहने की इच्छा जताई थी। उन्होंने चीन और तिब्बत के बीच 17 बिंदुओं का हुआ समझौता दिखाकर कहा था कि भारत में मेरे रहने का यह सही समय नहीं है।
नेहरू के कहने पर छोड़ी थी तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग
नेहरू के कहने पर छोड़ी थी तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग
दलाईलामा ने कहा कि भारत आकर हमने तिब्बत के मसले को यूएन के समक्ष उठाया। हम तिब्बत की स्वतंत्रता के बारे में सोच रहे थे। तब नेहरू ने मुझे सलाह दी कि आप तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग यूएन में मत उठाओ। अमेरिका कभी भी तिब्बत के लिए चीन से नहीं लड़ेगा। आपको चीन सरकार से ही बातचीत करनी चाहिए। 1974 में हमने तय किया अब हम न तो यूएन में इस मुद्दे को उठाएंगे और न ही स्वतंत्रता की बात करेंगे। चीन सरकार से बातचीत से ही मसले को सुलझाने की कोशिश करेंगे।




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